Tuesday, July 1, 2008

तपन

ऊँचे धरातल पर बैठ हम खो देते हैं
स्वयं को , अस्तित्व को , व्यष्टि को
सारी सृष्टि को प्रकाशित करने के लिए
सूरज को जलना पड़ता है
तभी वो पाता है देवत्व
श्रद्धा , सुमन , पुष्प , अर्घ्य
अगर उच्चता को प्राप्त करना हो
तो सन्नद्ध रहना होगा स्वयं को तपाने के लिए
बिना तपे सोना भी नहीं निखरता है
जीवन की कठिनाइयों की तपन
तपा-तपा कर मनुष्य को महान बनाती है
बत्ती के जिस भाग को लौ बनना होता है
उसे स्वयं जल कर प्रकाश फैलाना होता है
हम शीर्षस्थ बनने की कामना करते हैं
किंतु जलने से डरते हैं
इसी से सारी व्यवस्था अस्त- व्यस्त हुई है
क्या कोई दीप बिना जले
प्रकाश दे सकता है ?

1 comment:

rashmi said...

its really very nice. sabhi kavitayen bahut achhi hain mujhe tapan bahut achhi lagi. bahut hi saral bhasha me aapne jevan ki sachhai ko bataya hai.